दुनियाभर में बहुत सारे चाइनीज प्रोडक्ट्स का लोग इस्तेमाल करते हैं. भारत की बात करें तो यहां चाइनीज मोबाइल से लेकर सभी इलेक्ट्रॉनिक सामानों समेत खिलौने तक चाइनीज इस्तेमाल किए जाते हैं. इन चीजों के लोग इतने आदि हो गए हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता. इसी बीच अब जल्दी ही चीन दुनिया को एक आर्टिफिशियल सन भी देने वाला है. आइये जानते हैं क्या है पूरा मामला.
क्या है आर्टिफिशियल सन?
सबसे पहले तो जानते हैं कि आर्टिफिशियल सन क्या है. ये एक ऐसा न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर है, जो सूर्य की तरह ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया की नकल करता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ये तकनीक स्वच्छ, सुरक्षित और लगभग असीमित बिजली का बड़ा स्रोत बन सकती है.
चीन बनाएगा ‘आर्टिफिशियल सन’
इस प्रोजेक्ट के बारे में सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर भी बताया गया है. उन्होंने बताया है कि ‘आर्टिफिशियल सन’ (कृत्रिम सूरज) परियोजना बनाने के लिए उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन मैग्नेट बनाकर उसका सफल परीक्षण कर लिया है. ये उपकरण न्यूक्लियर फ्यूजन से स्वच्छ और लगभग असीमित ऊर्जा पैदा करने के लिए बेहद जरूरी माना जाता है.
इस वीडियो को शेयर करते हुए चीन के वैज्ञानिकों ने बताया है कि हेफेई न्यूक्लियर फ्यूजन प्रोजेक्ट तीन चरणों में आगे बढ़ रहा है. इसका लक्ष्य भविष्य में फ्यूजन तकनीक से बड़े पैमाने पर बिजली बनाना है. इसके तीन चरण इस प्रकार हैं:
- पहला चरण (2022–2035): फ्यूजन एक्सपरिमेंटल रिएक्टर से बिजली उत्पादन का सफल प्रदर्शन करना.
- दूसरा चरण (2030–2040): फ्यूजन इंजीनियरिंग रिएक्टर के जरिए बिजली उत्पादन का प्रदर्शन करना.
- तीसरा चरण (2040–2050): फ्यूजन कमर्शियल रिएक्टर को व्यावसायिक रूप से शुरू करना, ताकि आम लोगों और उद्योगों को इससे बिजली उपलब्ध कराई जा सके.
अगर ये योजना सफल रहती है, तो चीन आने वाले सालों में फ्यूजन ऊर्जा को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल करने वाले दुनिया के पहले देशों में शामिल हो सकता है.
कहां बन रहा ‘आर्टिफिशियल सन’?
ये मैग्नेट यानी आर्टिफिशियल सन चीन की चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के प्लाज्मा फिजिक्स संस्थान ने तैयार किया है. इसका आकार अंग्रेजी के D अक्षर जैसा है. ये 21 मीटर लंबा, 12 मीटर चौड़ा और 582 टन वज वाला है. वैज्ञानिकों का कहना है कि, ये मैग्नेट दुनिया की सबसे बड़ी फ्यूजन परियोजना ITER में इस्तेमाल होने वाले मैग्नेट से भी बड़ा और अधिक शक्तिशाली है.
ये लगभग 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान वाले प्लाज्मा को मजबूत चुंबकीय क्षेत्र में नियंत्रित रखने का काम करेगा, जिससे फ्यूजन प्रक्रिया संभव हो सकेगी. चीन का दावा है कि इस तकनीक को पूरी तरह अपने देश में बने उपकरणों और सामग्री से विकसित किया गया है. इससे फ्यूजन तकनीक के लिए विदेशी आपूर्ति पर उसकी निर्भरता खत्म हो गई है.
